भारत की आजादी में महिलाओं की देन ____________ चमक उठी सन 57 में वह तलवार पुरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह जब तो झांसी वाली रानी थी। यह कविता सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित रानी लक्ष्मीबाई पर लिखी गई है। क्या खूब कहा है सुभद्रा जी ने और जहां भारत में महिला सशक्तिकरण की बात आए तो आज भी भारत की नारियों में इतनी जोश भर जाती है कि, हर एक महिला अपने अंदर उनकी शक्ति और आत्मबल को महसूस करती है। और जहां तक मैं अपनी बात करूं तो मैं भी बचपन से रानी लक्ष्मीबाई की कहानियों को सुनकर बड़ी हुई हूं। हम सभी नहीं भूल सकते आजादी की लड़ाई – लड़ने वाली उन तमाम वीरांगनाओं को जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर हमारे भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों को निछावर कर दिया। यूं तो देखा जाए अगर तो इतिहास के पन्नों में वीरांगनाओं का स्थान धूमिल होता नजर आता है। जहां उनको अपना उचित स्थान मिलना चाहिए था वहां शायद अभी तक मिल ही नहीं पाया है। भारत को आजाद कराने वाली उन वीरांगनाओं ने अपने लहू का एक-एक कतरा बहाने से जो पीछे नहीं हटी उन महिलाओं का नाम तो भारत के शीर्ष मुकुट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए था। न जाने कितने ही नाम गुम से हो गए इतिहास के पन्नों में जिन्होंने अपने घर परिवार तक की परवाह किए बिना इस आजादी की जंग में कूद पड़ी। कुछ ने चूड़ियों की जगह पर हाथों में तलवार थाम लिया और कुछ ने कलम थामा और उतर आई युद्ध के मैदान में बस सिर्फ एक ही सपना आंखों में लिए कि अब भारत को आजाद कराना है। हिंदुस्तान को आजाद कराने के पीछे ना केवल पुरुषों का हाथ रहा बल्कि इनके साथ कुछ महिलाओं ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिसके बगैर उस परिस्थिति काल में आजादी की कल्पना भी करना नामुमकिन था। उनमें से कुछ चुनिंदा नामों का उल्लेख करना यहां काफी समीचीन होगा। 1.रानी चेन्नम्मा रानी चेन्नम्मा भारत की इतिहास के पन्नों में यह नाम भले ही दर्ज हो लेकिन शायद ही रानी चेन्नम्मा को हम याद रखते हैं। एक ऐसी बहादुरी से संघर्ष करने वाली महिला जिन्होंने सन 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम के 33 वर्ष पूर्व ही उन्होंने हड़प नीति के विरुद्ध अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया था। रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1778 काकती, बेलगांव, तहसील, बेलगाम जिला मैसूर, ब्रितानी भारत में हुआ। उनको कित्तूर रानी चेन्नम्मा के नाम से भी जाना जाता है। वह अंग्रेजों के साथ संघर्ष करने वाली भारत की पहली महिला थी। हालांकि युद्ध में लड़ते हुए उन्हें कामयाबी तो नहीं मिली किंतु यह अपने आप में बहुत बड़ी बात थी कि एक महिला ने अंग्रेज़ी सरकार को हिला कर रख दिया था। और युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया था, फिर अंग्रेजों के कैद में 2 फरवरी 1829 बैलहोंगल मैं उनका निधन हो गया। 2.लक्ष्मी सहगल लक्ष्मी सहगल एशिया की पहली महिला जिन्हें कर्नल का पद मिला रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टेन लक्ष्मी स्वामीनाथन उनका जन्म 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास में हुआ था। युवा अवस्था से ही लक्ष्मी सहगल ने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विदेशी वस्तुओं की होली जलाने में भी अपना योगदान दिया। सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व से लक्ष्मी सहगल काफी प्रभावित थी उनके दिए हुए एक साक्षात्कार को जब मैंने सुना तो लक्ष्मी जी ने बताया कि जिस जमाने में लड़कियों को बाहर तक नहीं निकलने की इजाजत थी उस समय लक्ष्मी जी ने घोड़े की सवारी करना क्रिकेट खेलना बहुत पसंद था। 1920 में जब गांधी जी ने आजादी की आंदोलन की शुरूआत किया, तब से लक्ष्मी जी को आजादी की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा मिली थी। लक्ष्मी जी ने कहा महात्मा गांधी ने “केसरिया हिंद” की उपाधि लौटा दिया था और रविंद्र नाथ ठाकुर ने” सर” की उपाधि लौट दी थी। जब सितंबर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध आरंभ हो गया था और भारतीय सेना मे मेडिकल सर्विस के लिए महिला डॉक्टरों को भी भर्ती किया जाने लगा उन दिनों सबसे अधिक महिला डॉक्टर मद्रास मे ही हुआ करती थी। लक्ष्मी स्वामीनाथन ने 1938 मे मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की थी। लक्ष्मी जी को पद्म विभूषण से सम्मानित भी किया गया। लक्ष्मी सहगल भारतीय स्वतंत्रता अभियान की एक क्रांतिकारी और भारतीय राष्ट्रीय सेना में अधिकारी होने के साथ-साथ आजाद हिंद सरकार में विमेन अफेयर्स मिनिस्टर भी थी। डॉ लक्ष्मी सहगल एक लंबी बीमारी के बाद 23 जुलाई 2012 की सुबह कानपुर के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 3.सुचेता कृपलानी भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी सुचेता कृपलानी सुचेता उन महिलाओं में से एक थी, जिन्होंने बापू के करीब रहकर देश की आजादी में अपना लगातार महत्वपूर्ण योगदान दिया। सुचेता जी का जन्म 25 जून1908 पंजाब में हुआ। और उनकी शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए उन्हें जेल की सजा भी हुई सुचेता जी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया था। 1 दिसंबर 1974 को नई दिल्ली में उनका देहावसान हो गया। 4.श्रीमती भिकाजी रुस्तम कामा श्रीमती मैडम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को मुंबई में एक पारसी परिवार में हुआ। भिकाजी रुस्तम कामा भारतीय क्रांति की मां कहलाती है। उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका से क्रांति का संचालन किया। एवं जेनेवा से वंदे मातरम पत्रिका भी निकाली मैडम भीकाजी कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थी जिन्होंने लंदन जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में वातावरण बनाया। सन 1909 में जर्मनी के स्टेट गार्ड में हुई अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम भीकाजी कामा ने कहा था भारत में ब्रिटिश जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है। भारत की आजादी के चार दशक पहले साल 1960में भी देश में पहली बार भारत का झंडा जर्मनी के इस गार्ड में हुई दुसरे इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में यह झंडा फहराया गया था, मैडम कामा के द्वारा यह भारत के आज के झंडे से अलग आजादी की लड़ाई के दौरान बनाए गए कई अनौपचारिक झंडे में से एक था। मैडम कामा की मृत्यु 13 अगस्त 1936 मे 74 साल की आयु में हुई थी। अहिल्याबाई होलकर इतिहास में अहिल्याबाई का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। अहिल्याबाई एक ऐसी महारानी थी जिन्होंने विभिन्न राज्यों के लिए बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए लोग उन्हें देवी स्वरूप मानते थे। अहिल्याबाई सुवेदार मल्हार राव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थी। अहिल्या बाई का जन्म 31 मार्च 1725 अहमदनगर जामखेड़ में हुआ चौडी गांव में हुआ था। अहिल्याबाई होल्कर ने कई योजनाएं भी शुरू की थी भेड़- बकरी विकास योजना पर बल दिया उन्होंने शासन व्यवस्था को अपने हाथ में लेने के लिए पेशवा के समक्ष याचिका भी दायर की 11 दिसंबर 1767 को वे स्वयं इंदौर की शासक बन गई।वह एक अकेली महिला प्रजा की रक्षा करती थी। अहिल्याबाई एक बहादुर योद्धा और एक जिम्मेवार प्रभावशाली शासक होने के साथ-साथ कुशल राजनीतिज्ञ भी थी। रानी अहिल्याबाई ने 70 वर्ष की उम्र में अपनी अंतिम सांसें ली और 13 अगस्त 1795 को उनकी जीवन सीमा समाप्त हो गयी । 6.डॉ एनी बेसेंट भारत की आजादी की लड़ाई में कुछ विदेशी महिलाओं ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनमें से एनी बेसेंट का नाम को भूले – भुलाया नहीं जा सकता। एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 कलेक्शन टाउन लंदन यूनाइटेड किंग्डम में हुआ था। उनकी शिक्षा वर्क बैक, हैरो स्कूल में हुई। एनी बेसेंट एक लेखिका, वक्ता एवं भारत प्रेमी थीं। उनको भारत से बहुत ही लगाव था। वो एक अध्यात्मिक, थियोसॉफिस्ट और महिला अधिकारों के समर्थक थी। 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा भी बनी। उन्होंने थियोस्फी (ब्रह्मविद्या) पर करीब 220 पुस्तकें भी लिखीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में फॉर ग्रेट रिलिजन, सम प्रॉब्लम्स ऑफ लाइफ, थॉट पावर, वेक अप, इंडिया, इंडिया एंड एंपायर, फॉर इंडिया अपलिफ्ट, इंडिया,ए नेशन इत्यादि कई पुस्तकें कुल 505 ग्रंथों व लेखों की रचना की उन्होंने भारत के भाइयों और बहनों को आखरी संदेश दिया कि मैं वृद्धा हूं किंतु मुझे विश्वास है कि मरने के पहले ही मैं देखूंगी कि भारत को स्वायत शासन मिल गया। उन्होंने अपनी आखिरी सांसें सितंबर 1933 को 85 वर्ष की उम्र में मद्रास मे ली। इसी के साथ वह इस दुनिया को अलविदा केह कर चली गई। हमें भी उनसे कुछ प्रेरणा लेनी चाहिए। 7.सरोजिनी नायडू सरोजिनी नायडू को भारत की कोकिला भी कहा जाता है।सरोजिनी नायडू जी का जन्म 13 फरवरी 1879 मे हैदराबाद मे हुआ था। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में “लेडी ऑफ दी लेक” नामक कविता रचि 1895 मे उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड गई और पढ़ाई के साथ-साथ कविताएं भी लिखी। 1914 में इंग्लैंड में वे पहली बार गांधी जी से मिली और उनके विचारों से प्रभावित होकर देश के लिए समर्पित हो गई। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व भी किया और जेल भी गई। सरोजिनी जी एक बहादुर वीरांगना की भांति देश के लिए गांव-गांव घूमकर देश प्रेम की भावना को लोगों में जगाया। 1932 में भारत की प्रतिनिधि बनकर दक्षिण अफ्रीका भी गई। और भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्तर प्रदेश की पहली राज्यपाल बनी। उन्होंने देश के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य भी किए जिनका कर्ज़ शायद हम नहीं चुका सकते और फिर सरोजिनी जी के बारे मे, मैं जितना भी लिखू शायद शब्द कम पड़ रहे हैं। मुझे लगता है कि वह हम महिलाओं के लिए एक मिसाल बनी रहेंगी। उनकी मृत्यु 2 मार्च 1949( 70) वर्ष की उम्र में इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में हुई। 8.विजयलक्ष्म पंडित विजयलक्ष्मी जी भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन थी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इस वीरांगना ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनका जन्म 18 अगस्त 1900 को गांधी परिवार में हुआ था। इनका विवाह 1921 में काठियावाड़ के सुप्रसिद्ध वकील रंजीत सीताराम पंडित से हुई। गांधीजी से प्रभावित थीं और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेना आरंभ कर दिया था। विजयलक्ष्मी जी को इस दौरान कई बार जेल भी जाना पड़ा। इन्हें स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन करने के आरोप में लखनऊ के जेल में भी डाला गया। विजय लक्ष्मी पंडित 1937 में ब्रिटिश इंडिया के यूनाइटेड प्रोविंसेज में कैबिनेट मंत्री भी बनी थी। तत्पश्चात 1 दिसंबर 1990 देहरादून में उनकी जीवन काल समाप्त हो गया। हमें विजयलक्ष्मी जी से सीखना चाहिए कि जीवन में कभी असफलता से निराश नहीं होना चाहिए देश के प्रति उनके अमूल्य प्रेम को यह दर्शाता है कि महिला पुरुषों से कम नहीं रहीं चाहे वह किसी भी समय रहा हो कोई भी परिस्थिति रही हो। 9.प्रीतिलता वादेदार 5 मई 1911 पटिया, उप जिला, बांग्लादेश मैं एक बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम प्रीति लता रखा गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महान क्रांतिकारीणी थी प्रीति लता जी। एक ऐसी शख्सियत एक निडर निर्भीक लेखिका बनी। प्रीतिलता को देश से बहुत ही प्रेम था वह अपने देश भारत के लिए कुछ करना चाहती थी। वह क्रांतिकारियों से काफी प्रभावित हुई और प्रीति जी उनके दल की सदस्य भी बनी। एक बार उनका एक क्रांतिकारी साथी रामकृष्ण विश्वास कोलकाता के अलीपुर जेल में था उनको फांसी की सजा सुनाई गई थी। उनसे मिलना आसान नहीं था। लेकिन प्रीति लता उनसे कारागार में 40 बार मिलने गई। ये प्रीति लता की बुद्धिमता और बहादुरी को दर्शाता है और फिर सूर्य सेन के नेतृत्व मे इंडियन रिपब्लिक आर्मी महिला सैनिक भी बनी। प्रीति लता जिन्होंने अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ में कई अंग्रेजों को गोली भी मारी और आखिर लड़ते-लड़ते जब उनके शरीर में एक गोली लगी तो उन्होंने पोटेशियम साइनाइड खा लिया उस समय सिर्फ 21 साल की थी प्रीतीलता। एक बहादुर क्रांतिकारी महिला थीं वो यह दुखद घटना 23 सितंबर 1932 चटगांव बांग्लादेश में हुआ। इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी जी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री, हमारे राष्ट्र की गौरव और अब तक की एकमात्र प्रथम महिला प्रधानमंत्री रही। इंदिरा जी इंदिरा जी का जन्म 19 नवंबर 1917 प्रयागराज में नेहरू परिवार में हुआ था। पिता जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री तथा माता कमला नेहरू इंदिरा जी को गांधी उपनाम फिरोज गांधी से विवाह के बाद मिला था। 1934 से 1935 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर इंदिरा ने शांतिनिकेतन में रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश या। रविंद्र नाथ टैगोर ने उन्हें प्रियदर्शनी का नाम दिया। इंदिरा गांधी जी ऑक्सफोर्ड से वर्ष 1941 में भारत वापस आने के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गई। लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद तत्कालीन कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष के. कामराज इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने मे निर्णायक रहे। उनका राजनीतिक जीवन काफी सक्रिय रहा। तत्पश्चात 31 अक्टूबर 1984 नई दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गयी। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसी बहुत सारी महिलाएं हैं जिनकी महत्वपूर्ण रही और इनका विवरण और बखान करना वह भी एक निश्चित अंतराल में असंभव है इनमें से कुछ और भी नाम शामिल है जिनमें मुख्य रूप से 11.उषा मेहता 29 मार्च 1920 से 11 अगस्त 2000 12.दुर्गाबाई देशमुख 18 अगस्त 1900 से 1 दिसंबर 1990 13.बेगम हजरत महल 1820 से 1879 14.कमला नेहरू 1 अगस्त 1899 से 1936 15.अरूणा आसफ अली 16 जुलाई1909_29 जुलाई 1996 16.कस्तूरबा गांधी 1869 से 1944 गदरी गुलाब कौर रानी गाइदिनल्यू 19.मीरा बेन इस प्रकार भारत की आजादी में कुछ महिलाओं के योगदान को मैंने लिखा और पढ़ा उनके बारे में भी जाना और जब मैंने उनके बारे में जैसे-जैसे अपनी जानकारी बढ़ाई मुझे इन सारी महिला क्रांतिकारियों में एक ही बात नजर आई कि अपने देश भारत के प्रति इनकी देशभक्ति की भावना सबका एक ही मकसद भारत को ब्रिटिश मुक्त बनाना था। अपने प्राणों को जिस तरह इन्होंने निछावर कर दिया अपना अमूल्य समर्पण किया उनके प्रति हम आजीवन कर्जदार रहेंगे। शायद यह उन दिनों की बात है जब एकजुट होकर यह महिलाएं पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के आंदोलन में कूद पड़ी थी लेकिन भारत के इतिहास में मुझे ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं उनको उनका हक नहीं मिल पाया है। आज हम 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं जब उनके त्याग और बलिदान को याद करते हैं तो, मुझे ऐसा लगता है की सिर्फ़ किताबों में ही यह कुछ नाम दर्ज होकर रेह गये हैं। यह आज बहुत आश्चर्य लगता है कि कुछ महिला स्वतंत्रता सेनानियों का नाम तो मुझे आज भी पता नहीं,तो ऐसा है अगर तो क्यूँ है? यह प्रश्न मेरे मन में क्यों बार-बार उठता है कि, हम उन महान पुरुषों का तो स्मृति दिवस मनाते हैं लेकिन महिलाओं के स्मृति दिवस और पुण्यतिथि क्यों नहीं मनाया जाता है, क्या हमें आज भी उनके अधिकार के लिए लड़ना होगा? कुछ इन्हीं शब्दों के साथ में अपने कलम को विराम देती हूं। जय हिंद, जय भारत अर्चना राणा

विनोद बिहारी मुखर्जी भारत के गौरव…


विनोद बिहारी मुखर्जी एक ऐसा नाम जिसे कभी पहचान की जरूरत नहीं पड़ी। विनोद बिहारी जी एक ऐसे सुप्रसिद्ध कलाकार थे, जिनके आगे दृष्टिहीनता भी उनके कला सृजनता में बाधा नहीं बन सकी। विनोद बिहारी जी का जन्म 7 फरवरी 1904 को बेहला कोलकाता मेहुआ। उन्होंने कला शिक्षा के लिए 1919 में विश्व भारती विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। वह नंदलाल बोस के छात्र और मशहूर मूर्तिकार रामकिंकर बैज के सहपाठी रहे थे। उनके कला में समय-समय पर शांति निकेतन आने वाले चीनी और जापानी कलाकारों का प्रभाव देखा जा सकता है। 1937 से 38 के मध्य वे जापान गए जहां उन्होंने जापानी चित्रकार टोबा सोजो के साथ काम किया। उनकी कला को पिकासो से प्रभावित भी कहा जाता है। जब वह सूरजमुखी का फूल चित्रित करते हैं या चोखानों को अपने चित्रों में स्थान देते हैं। उन्होंने काठमांडू संग्रहालय में क्यूरेटर का कार्य और राजस्थान में बनस्थली विद्यापीठ मे अध्यापन भी किया। उन्होंने अपनी पत्नी लीला के साथ मसूरी मे एक कला प्रशिक्षण विद्यालय शुरू किया और बाद में कलाभवन लौटकर प्राचार्य बन गए। 1956 में नेत्र ज्योति से पीड़ित होने के बावजूद वे कला सृजन में लगे रहे। 1974 में उन्हें पद्म विभूषण और 1977 में विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा देशीयकोटाम से सम्मानित किया गया। उनके शिष्य सत्यजीत राय ने उनके ऊपर’ दी इनाइ आई’ नामक वृत्तचित्र का निर्माण किया। 11 नवंबर 1980 में 76 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। विनोद बिहारी मुखर्जी की बेटी मृणालिनी भी चित्रकार है। विनोद बिहारी जी की प्रमुख पुस्तकों में द आर्टिस्ट, Life of Medieval Saints, चित्रकार है। अभी हाल ही में लंदन के डेविड ज्विरनर गैलरी में विनोद बिहारी मुखर्जी की कलाकृतियां आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी इसे 10 जनवरी 2020 से 22 फरवरी तक चलाया जा रहा है। इन चित्रों को उन्होंने आंखों की रोशनी जाने के बाद 1956 के अंत से 1960 के अंत तक बनाया था जिनका कोलाज बनाकर इस प्रदर्शनी में रखा गया है मेरे ख्याल से ये हमारे लिए बहुत ही गौरवपूर्ण बात है, कि हमारे देश में ऐसे सुप्रसिद्ध विनोद बिहारी मुखर्जी जी जैसे कलाकार का जन्म हुआ है।जय हिंद
अर्चना राणा
जामताड़ा

सुभाष जाने हिंद हैं… सुभाष शाने हिंद हैं…
क्योंकि सुभाष अमर हैं अमर रहेंगे हर एक देशभक्त के दिल में। आज जिस स्वतंत्र हिंदुस्तान में हम सांस ले रहे हैं, हमें इस बात का जरा सा भी एहसास नहीं होगा कि शिवाय सोशल मीडिया और ट्विटर पर अपनी नैतिकता निभाने के अलावा हम कभी इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे एक अकेले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिसने भारत की आजादी के लिए देश से बाहर जाकर जापान से मदद ली और अपनी एक सेना तैयार की ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हिंदुस्तान की आजादी के लिए, आजाद हिंद फौज जिसको जर्मनी , जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, और आयरलैंड ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता भी दी थी। और नेताजी ने आजाद भारत का सपना देखा और जो आज साकार भी हुआ। मेरे ख्याल से आज हर तरफ संचार की सुविधाएं हैं इंटरनेट की दुनिया है, यानी डिजिटल वर्ल्ड टेक्नोलॉजी अपने चरम सीमा पर है और यही अगर जब हम बात करें सुभाष चंद्र बोस की तो वो एक अकेले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिससे ब्रिटिश सरकार भी डरती थी। 29 नवंबर 1940 में जब नेताजी ने जेल में आमरण अनशन किया तो ब्रिटिश सरकार को उन्हें मजबूरन छोड़ना पड़ा। उस समय जब भारत को आजाद कराने के लिए लोग आजादी के नाम पर जान दे दिया करते थे। कैसे लोगों में इतनी एकता थी कि हिंदुस्तान को आजाद कराने के लिए लोग अलग-अलग पार्टी के जरिए भारत की अनेकता में एकता के लिए एकजुट होकर लड़ते थे। हिंदुस्तान की आजादी के लिए बच्चे बच्चे के मन में लड़ मिटने का जज्बा था और नेताजी का वह एक नारा जय हिंद मानों जैसे बच्चे बच्चे की रगों में एक आजादी के लिए एक लहर दौड़ जाती थी। 5 दिसंबर 1940 में नेताजी को जब उन्हीं के घर में नजरबंद कर दिया गया था और बंगाल की सी. आ. ईडी को उनकी निगरानी का काम सौंपा गया था, कहते हैं नेताजी को वेश बदलने में महारत हासिल थी और उन्होंने घर पर ही अपनी दाढ़ी बढ़ाई और पेशावर से मियां अकबर को खत लिखा रिच कैल्काटा.. और कोलकाता से काबुल भागने का प्लान बनाया, अपने भतीजे शिशिर से बात की और अंग्रेजों की नजरों से बचकर एक गाड़ी से धनबाद पहुंचे नेता जी ने एक इंश्योरेंस एजेंट का वेश बनाया और अपना नाम जियाउद्दीन रख लिया था। हम नहीं भूल सकते 16 जनवरी 1941 देर रात 1:35 मिनट नेताजी के घर से शुरू हुई( द ग्रेट स्केप) और धनबाद के गोमो जंक्शन पर खत्म हुआ था।नेताजी का जन्म 23 जनवरी सन 1897 को ओडिशा के कटक शहर में हिंदू कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे और अंग्रेजी सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। नेताजी कटक के प्रोटेस्टेंट स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर 1909 में उन्होंने रिवेन्शा कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लिया। 1915 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा बीमार होने के बावजूद द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। और कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान लिया था। 15 सितंबर 1919 को आईसीएस की परीक्षा की तैयारी करने के लिए नेताजी इंग्लैंड चले गए। 1920 में वरीयता सूची में उन्होंने चौथा स्थान प्राप्त करते हुए आईसीएस पास किया। बहुत जल्द ही सुभाष देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए 1927 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब कांग्रेस ने उनका विरोध किया और कोलकाता से सुभाष ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था। 1942 में एमिली शेंकल नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उन्होंने विवाह किया और वियना में उनकी पुत्री ने जन्म लिया जिसे सुभाष पहली बार तब मिले जब वह सिर्फ 4 सप्ताह की थी। उनका नाम अनीता बोस है। कहते हैं 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे इस सफर के दौरान वे लापता हो गए और उस दिन के बाद कभी दिखाई नहीं दिए। 23 अगस्त को टोक्यो ने बताया कि सैंगोल में नेताजी 18 अगस्त को ताइहोकू के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और नेताजी गंभीर रूप से जल गए ताइहोकू सैनिक अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने इस घटना की जांच करने के लिए 1956 और 1977 में दो बार आयोग नियुक्त किया नेताजी उस विमान दुर्घटना में नहीं मरे 1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया उसे 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 18 अगस्त 1945 के दिन नेताजी कहां लापता हो गए आगे क्या हुआ यह भारतीय इतिहास मे अनुत्तरित रहस्य बन गया है।आज 74 साल बाद भी उनकी तलाश जारी है। जय हिंद
अर्चना राणा
जामताड़ा।